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You searched for: creator:"प्रफुल्ल कोलख्यान"
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[texts]ठीक नहीं जी, हाँ ठीक नहीं - प्रफुल्ल कोलख्यान
यह माना गहन अँधेरा हैयह भी कि दूर सबेरा हैपर चुप्पा-चुप्पी ठीक नहींमाथे पर धर हाथ बैठनाचुप रहना और सब सहनाठीक नहीं जी, हाँ ठीक नहीं 
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; कविता; kolkhyan; hindi; kavita
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[texts]लोग बेखौफ हैं - प्रफुल्ल कोलख्यान
लोग बेखौफ हैंउन्हें एक ही शिकायत थी फिलहाल किगुब्बारों के फूटने या फोड़ दिये जाने के बारे मेंकानूनी स्थिति उतनी साफ नहीं है इस मुल्क में
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; कविता; kolkhyan; hindi; kavita
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[texts]आलोचना की संस्कृति - प्रफुल्ल कोलख्यान
जीवन-विवेक न उभय-निष्क्रियता की बात करता है और न निष्पक्षता की। ऐसा इसलिए कि विषम समाज अपनी निर्मिति में ही पक्षपातपूर्ण होता है। पक्षपातपूर्ण वातावरण में, निष्पक्षता चालू पक्षपातपूर्ण व्य...
Keywords: कोलख्यान; संस्कृति; आलोचना; kolkhyan; hindi
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[texts]साहित्य, समाज और जनतन्त्र - प्रफुल्ल कोलख्यान
यह सहज ही परिलक्षित हो जाता है कि विरोध या अंधविरोध की प्रवृत्ति से परंपरा  की जीवित और जीवनदायनी शक्ति की क्षयशीलता में उतनी वृद्धि नहीं होती है जितनी कि नासमझ परंपरा-प्रेम या-अंधप्रेम के आग...
Keywords: कोलख्यान; साहित्य; समाज; जनतन्त्र; kolkhyan
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[texts]नव-नैतिकता की तलाशः गमे रोजगार भी, गमे इश्क भी - प्रफुल्ल कोलख्यान
अन्याय और अनैतिकता सहोदर हैं विषमता इनकी जननी है। अन्याय और अनैतिक स्थिति में मनुष्य जी नहीं सकता है इसलिए दुनिया मुट्ठी में करनेवालों को  भी कदम-कदम पर न्याय और नैतिकता की जरूरत होती है। इस ...
Keywords: कोलख्यान; नवनैतिकता; नैतिकता; समाज; हिंदी; kolkhyan; hindi; navnaikta
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[texts]देश में जनादेश का संदेश - प्रफुल्ल कोलख्यान
भारत में जनतंत्र बहुत लंबे संघर्ष के बाद स्थापित हुआ है। जनतांत्रिक व्यवस्था में जनादेश का बहुत महत्त्व होता है। जनादेश को समझने में हुई चूकों की भारी कीमत समाज को चुकानी पड़ती है। यह कीमत त...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; जनादेश; kolkhyan; hindi
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[texts]दूर के रिश्तेदार - प्रफुल्ल कोलख्यान
झुर्रियों की लिपि दर्द की भाषा पढ़ने की कोई तरकीब होती या रिश्तों की दूरी मापनेवाला कोई फीता होता तो कोई बड़ी आसानी से नाप ले सकता कि मैं और मेरे जैसे बहुत सारे बेटे अपने-अपने माँ-बाप के कितने द...
Keywords: कोलख्यान,हिंदी,kolkhyan,hindi
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[texts]विचार, समाज और साहित्य - प्रफुल्ल कोलख्यान
कुछ विचारक जिन्हें हम उनकी तमाम भाव-भंगिमाओं और उछल-कूद के बावजूद साहित्यिक ही समझते हैं उनके खुद का दावा दार्शनिक होने का प्रतीत होता है और क्या पता वे हों भी! संक्षेप, में यहाँ हमारा आशय सिर्...
Keywords: कोलख्यान; विचार; समाज; साहित्य; आलोचना; kolkhyan
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[texts]साहित्य सामज और जनतंत्र - प्रफुल्ल कोलख्यान
वस्तुत: साहित्य, समाज और जनतंत्र चक्रमान मानव-अस्मिता के समबाहु त्रिभुज की आधार-रेखाएँ हैं। इनमें से एक के भी अ-स्थिर या कंपित-झंपित होने से मानव विरोधी मानवीय प्रवृत्तियों की वैधता के लिए जग...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; साहित्; समाज; जनतंत्र; kolkhyan; hindi; sahitya; samaj; jantantra
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[texts]जल बीच मीन पियासी - प्रफुल्ल कोलख्यान
यह बिल्कुल निराधार आशंका नहीं है कि जिनके हित में आंतरिक उपनिवेश का बने रहना ही जरूरी था उन्हीं के हाथों में बाहरी उपनिवेश से मुक्ति के नेतृत्व का होना इस आत्मघात का प्रमुख कारण बना। तात्पर्...
Keywords: कोलख्यान; स्त्री-विमर्श; आलोचना; हिंदी; kolkhyan; hindi
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[texts]इनकार का हक और हक का इनकार - प्रफुल्ल कोलख्यान
मकान बनाने की ललक बढ़ी है। घर बसाने की ईहा कम हुई है। तलाक की घटना की संख्या में चिंतनीय वृद्धि हुई है। इन्हें जीवन-यापन में स्थायित्व के अवसरों की कमी से भी जोड़कर देखा जा सकता है। ......
Keywords: कोलख्यान; नैतिक; आलोचना; kolkhyan; hindi
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[texts]हिंदी साहित्य, समाज और 1857 - प्रफुल्ल कोलख्यान
अपने अधिकांश में इतिहास लेखन की प्रक्रिया राजनीतिक प्रक्रिया की अधीनस्थ कार्रवाई है। इतिहास लेखन की इस ऐतिहासिक अधीनस्थता को समझने से यह बात ठीक से साफ हो पायेगी क्यों इतिहास-लेखन विजेता क...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; साहित्य; kolkhyan; hindi; 1857
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[texts]भारत संघ की संरचना - प्रफुल्ल कोलख्यान
मुझे इस बात की चिंता हो रही है कि भारत संघ की आंतरिक संरचना में विघटनकारी बदलाव हो रहे हैं। भारत का संविधान एक विचार भी है और भावना भी।
Keywords: कोलख्यान; हिंदीसआलोचना; kolkhyan; hindi
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[texts]इतिहास से आती लालटेनों की मद्धिम रोशनियाँ - प्रफुल्ल कोलख्यान
मानव सभ्यता की लंबी यात्रा में, अबौद्धिकता का जोखिम उठाते हुए भी, सुकुमार सपनों का सनातन निवास कविता ही रही है। कविता में जीवन के यथार्थ के प्रति सलूक का अपना सलीका होता है। हमारे समय में इस सभ...
Keywords: kolkhyan; hindi; vimlesh; कोलख्यान; आलोचना
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[texts]नये इलाके में दुनिया रोज बनती है - प्रफुल्ल कोलख्यान
अरुण कमल और आलोकधन्वा समकालीन हिंदी कविता के प्रतिष्ठित कवि हैं। यही नहीं, दोनों प्रगतिशील परिवर्तनकार्मी चेतना के संवाहक कवि है। दोनों का वृहत्तर सामाजिक, वैचारिक एवं दार्शनिक परिप्रेक्...
Keywords: कोलख्यान; अरुणकमल; आलोकधन्वा; कविता; हिंदी; kolkhyan; hindi; arunkamal; alokdhanwa
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[texts]खुद को जीना सिखलाया - प्रफुल्ल कोलख्यान
मैं ने अपने जख्मों को अपने दुख पर हँसना सिखलाया
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; कविता; kolkhyan; hindi; kavita
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[texts]रहनुमा चाहिए कि नवाब चाहिए - प्रफुल्ल कोलख्यान
मेरे दुख में जो रहे नहीं शरीक, उनको भी इंतखाब चाहिए।अब आप ही करें तय कि रहनुमा चाहिए कि नवाब चाहिए।
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; कविता; kolkhyan; hindi; kavita
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[texts]SRIJANA SE SRISHTI SE SAMVAD - प्रफुल्ल कोलख्यान
तुम्हारी कोख में रहकर मैंने जाना, कि स्त्री होना सृजन का सृष्टि से संवाद होना है
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; kolkhyan; hindi; srijan; shrishti; सृजन; सृष्टि
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[texts]हिंदी जातीयता और समाज - प्रफुल्ल कोलख्यान
बंगाल और पंजाब का जहाँ भूगोल बँटा वहीं जिसे हिंदीभाषी क्षेत्र कहा जाता है उसकी भाषाएँ/ बोलियाँ प्रशासकीय स्तर पर व्यावहारिक रूप में स्थगित हो गई। इन भाषाओं/ बोलियों का यह स्थगन, भूगोल के बँटन...
Keywords: kolkhyan; hindi; कोलख्यान; हिंदी; जातीयता; रामविलासशर्मा
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[texts]चिढ़ का चौताल - प्रफुल्ल कोलख्यान
अधिक पढ़े-लिखे आदमी का इतिहास से जो रिश्ता होता है, कम पढ़े-लिखे का वही नाता किंवदंतियों से होता है। कम पढ़ा-लिखा आदमी किंवदंतियों की चरितकथा की छानबीन में अपना वक्त जाया नहीं करता, प्रेरणा ले...
Keywords: कोलख्यान; kolkhyan
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[texts]हिंसा पर टिकी सभ्यता - प्रफुल्ल कोलख्यान
नागार्जुन जैसे बड़े कवि कहते हैं कि प्रति-हिंसा ही उनके कवि का स्थायी भाव है। ऐसा कहने के पीछे कवि की वेदना है, इसे उल्लास की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए। यह एक गहरी बात है। इसे फूंक मार कर उड़ा देन...
Keywords: कोलख्यान; हिंसा; सभ्यता; kolkhyan; hindi; हिंदी
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[texts]अपने मोर्चे पर मरने की जिद्द - प्रफुल्ल कोलख्यान
.... घर के बदले पहुँच गया अजायब घर। डेढ़ दो घंटे तक घूम-फिर कर देखने के बाद मन कुछ हल्का था। और था यह एहसास कि किन-किन मुश्किलों का सामना करते हुए, उन पर अपने ढंग की विजय हासिल करते हुए मनुष्य आज तक क...
Keywords: kolkhyan; hindi; कोलख्यान
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[texts]श्रद्धा से तिकड़म का नाताः पियो संत हुगली का पानी - प्रफुल्ल कोलख्यान
क्या हिंदी समाज  श्रद्धा से तिकड़म का नाता तोड़ने का प्रयास कर पायेगा? सवाल यह भी है कि इस प्रयास में हिंदी साहित्य के युवा हस्तक्षेप की प्यासी पथरायी आँखें चौराहे के उस नुक्कड़ पर अपनी क्या भ...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; कविता; समाज; kolkhyan; hindi
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[texts]हमें जिंदा रहना है दुख पर काबू पाने के लिए - प्रफुल्ल कोलख्यान
मेरी बच्ची सुबह-सुबह मेरे लिए चाय बना रही हैबावजूद दुख के इससे अधिक खुशगवार सुबह मेरे लिए हो नहीं सकतीएक ऐसी सुबह जहाँ से अंधेरे के खिलाफ मद्धम-मद्धम आवाज आती होऔर चाय के खौलते पानी के साथ मेर...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; कविता; kolkhyan; hindi; kavita
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[texts]कैसे कहूँ, कह नहीं सकता, क्यों गंधमादन रोज दस्तक देता है - प्रफुल्ल कोलख्यान
किसके होने से कच्चे सपनों की मादक महक मुझे दीवाना बना देती हैकिसकी तलाश में मेरे आकाश का चाँद बादलों में सारी रात भटकता हैकिसकी पुकार पर खुशगवार चाँदनी मेरी आँखों में नंगे पाँव टहलती हैकौन ह...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; कविता; kolkhyan; hindi; kavita
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[texts]पाप के दिन में भी जो नष्ट होने से बच गया - प्रफुल्ल कोलख्यान
आज धर्मवाद और बाजारवाद का नवसंश्रय जगजाहिर है। हमारे जातीय प्रसंग में तो यह लगभग सबसे बड़ा खतरा बनकर आया है। आये भी क्यों नहीं, आखिर तैंतीस कोटि देवी-देवताओं के रोजगार का मामला है! यह धर्मवाद ...
Keywords: कोलख्यान; राजकिशोर; कविता; kolkhyan; hindi
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[texts]जीवन के दिन-रैन का, कैसे लगे हिसाब - प्रफुल्ल कोलख्यान
कभी-कभी छोटी मछलियों को निगलना जितना आसान होता है उसे हजम करना उतना ही मुश्किल होता है। बहुराष्ट्रीय पूँजी की दुष्टताएँ अंतत: राष्ट्रीय पूँजी को विषाक्त बना देती हैं। दक्षिणपंथ का भूमंडलीक...
Keywords: कोलख्यान; कट्टरता; अरुण; आलोचना; हिंदी; kolkhyan; hindi
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[texts]सभ्यता फिर भी उम्मीद से है - प्रफुल्ल कोलख्यान
बाजारवाद मछली के ही तेल में मछली को भुनने की कारीगरी जानता है। मकरजाल की तरह ‘मनुख-जाल’ उपभोक्ता मन के भीतर से पैदा होता है। …बाजारवाद की मनोरंजक संस्कृति हँसते-हँसाते मनुष्य की प्रतिरोध क्ष...
Keywords: कोलख्यान; सभ्यता; बाजारवाद; kolkhyan
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[texts]मन उढ़रल जाइ - प्रफुल्ल कोलख्यान
कहियो सोन त बूझै आखारलागए जेना, झूठक अवतारई है सरकार, हो उहे सरकारवोटवा के बतहा करए ब्यौपार
Keywords: कोलख्यान; कविता; हिंदी; kolkhyan; kavita; hindi
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[texts]अभी समर शेष है - प्रफुल्ल कोलख्यान
सभ्यता और संस्कृति में स्वाभाविक गतिशीलता होती है। इस गतिशीलता को प्रगतिशीलता में बदलने की कोशिश भी जारी रहती है। इस गतिशीलता और प्रगतिशीलता से उत्पन्न बदलाव में स्वाभाविक क्रमिकता होती ह...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; साहित्य; आलोचना; लेख; kolkhyan; hindi; lekh
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[texts]दगा की, इस सभ्यता ने दगा की - प्रफुल्ल कोलख्यान
जब-जब यह निरपराध आम आदमी मारा जाता है तब-तब तथाकथित खास आदमी की सुरक्षा कड़ी कर दी जाती है । जिस सभ्यता में राजा को किला बनाकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने की छूट हासिल होती है, वह सभ्यता एक दगाब...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; kolkhyan; hindi
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[texts]आलोचना की संस्कृति - प्रफुल्ल कोलख्यान
जीवन-विवेक न उभय-निष्क्रियता की बात करता है और न निष्पक्षता का। ऐसा इसलिए कि विषम समाज अपनी निर्मिति में ही पक्षपातपूर्ण होता है। पक्षपातपूर्ण वातावरण में, निष्पक्षता चालू पक्षपातपूर्ण व्य...
Keywords: कोलख्यान; आलोचना; संस्कृति; kolkhyan; alochana; hindi
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[texts]Prafulla Kolkhyan TERAH KATHWA - प्रफुल्ल कोलख्यान
एक कहानीः तेरह कट्ठवा एक तरफ बाढ़ का पानी और दूसरी तरफ कुमिया की अधखुली आँख की कोर से ढरकते आँसू। उस आँसू की भाखा कौन पढ़े। जो पढ़े सो ज्ञानी होए। जनम कृतार्थ हो जाये। दोनो तरफ पानी-ही-पानी। पा...
Keywords: कहानी; कोलख्यान; hindi; kahani
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[texts]जीने के लिए चाहिए सारे-के-सारे औजार - प्रफुल्ल कोलख्यान
कविता को चाहिए उदास जीवन के अंत:करण में बची हुई करुणा का अंतिम राग। कविता को चाहिए ग्लेशियर की आत्मा में सोई हुई आग की अंतिम लौ। कविता को चाहिए प्रथम और प्रथमा के अद्वैत प्रगाढ़ आलिंगन की पहली ...
Keywords: कोलख्यान; कविता; आलोचना; अनिमेष; हिंदी; kolkhyan; hindi
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[texts]आँसू की छाया - प्रफुल्ल कोलख्यान
साहित्य के कमलवन में छिड़े गजग्राह युद्ध से बहुत दूर ऐसे संघर्षशील लोग कहीं भी मिल सकते हैं। गजग्राह युद्ध के बाहर यह पीपिलिका संघर्ष किसलिए जारी रहा करता है! क्या मिलता है? अभिव्यक्ति का सुख?...
Keywords: kolkhyan; Aasu ki chhaya; hindi; कोलख्यान; हिंदी; आँसू की छाया
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[texts]प्रफुल्ल कोलख्यान की कुछ कविताएँ - प्रफुल्ल कोलख्यान
एक अच्छी कविता के बारे मेंसोचते हुएमैं आपके बारे मेंसोचने लगता हूँआपके बारे मेंसोचते हुए मैंएक अच्छी कविता के बारे मेंसोचने लगता हूँ
Keywords: कोलख्यान; कविता; kolkhyan; hindi
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[texts]बच्चा उदास है - प्रफुल्ल कोलख्यान
होशियार बच्चेतमीज दे रहे हैं किअपराध हैजाना इस खेल के खिलाफ
Keywords: कोलख्यान; कविता.हिंदी; kolkhyan; kavita; hindi
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[texts]भारत भकोसवा ऐ रामा - प्रफुल्ल कोलख्यान
भारत भकोसवा ऐ रामाचैत महीनवाँ ऐ रामालह, लह लहकावै, लहर-लहरिया उठावैझर, झर, झहरावै लहरिया झरकौआ
Keywords: कोलख्यान; भारत; भकोसवा; कविता.हिंदी; kokhyan; hidi; bharat
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[texts]बाकलम खुद कुमारिल खुद प्रभाकर हिंदी के नामवर - प्रफुल्ल कोलख्यान
वस्तुत: आलोचना का काम साहित्य और संस्कृति में सक्रिय अंधबिंदुओं की पहचान और साहित्य और संस्कृति के उपादानों के सहारे ही अंधबिंदुओं को निष्क्रिय कर दृष्टिबिंदुओं को सक्रिय बनाने का है। बहैस...
Keywords: कोलख्यान; नामवर; आलोचना; kolkhyan; namvar; alochana; hindi
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[texts]फगुनवाँ में - प्रफुल्ल कोलख्यान
फगुनवाँ में, पोरे-पोर गुलाल लागेबुढ़िया के अजगुत श्रृँगार लागे होफगुनवाँ में, सब के गाते बयार लागे
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; गीत; Kolkhyan; hindi; geet; फागुन
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[texts]प्रफुल्ल कोलख्यान की कविता - प्रफुल्ल कोलख्यान
प्रफुल्ल कोलख्यान की कविता
Keywords: कोलख्यान,कविता,kolkhyan
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[texts]देश में जनादेश का संदेश - प्रफुल्ल कोलख्यान
गुजरात के जनादेश का एक पाठ राजनीतिक है, तो दूसरा पाठ सांस्कृतिक और सामाजिक भी है। राजनीतिक दल अपने हित साधन के लिए इसका राजनीतिक पाठ तैयार कर रहे हैं। हमारी चिंता इस जनादेश के सांस्कृतिक और सा...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; गुजरात; जनादेश; kolkhyan; hindj; gujrat
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[texts]केदारनाथ सिंह की कविता बाघ - प्रफुल्ल कोलख्यान
श्रीकांत वर्मा की कविता में यह बात रेखांकित है कि सुने जाने का रिवाज खत्म हो जाने पर सोचे जाने के अभाव का हाहाकार ही बचता है। केदारनाथ सिंह की कविता में नगरवासी सोचते हुए पाये जाते हैं-- नगरवास...
Keywords: कोलख्यान; केदारनाथ; बाघ; कविता; kolkhyan
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[texts]अभी समर शेष है - प्रफुल्ल कोलख्यान
अनुभवसिद्ध बात है कि अर्थ का निजी स्वभाव ऊर्ध्वगामी होता है।जब तथाकथित नई अर्थनीति का भारत में प्रारंभ हो रहा था उस समय `ट्रिकिल डाउन' सिद्धांत की बड़ी चर्चा थी। इस सिद्धांत के अनुसार अर्थ का ...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; बाजारवाद; kolkhyan; hindi
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[texts]भारतीयता का सार - प्रफुल्ल कोलख्यान
उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण के इस दौर में भीतरी और बाहरी, अपने और पराये, स्थानिक और वैश्विक, तात्कलिक और शाश्वत, शक्ति और शील, सौंदर्य और शिव, नूतन और पुरातन के बीच के द्वंद्व, तनाव और संतुलन बि...
Keywords: kolkhyan; Hindi; Bhartiyta; Alochana
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[texts]पर हित और पराई पीर - प्रफुल्ल कोलख्यान
 ‘सर्वभूतों’ को आत्मवत बतानेवाली संस्कृति में ‘पराई पीर’ और  ‘पर हित’ का ‘पर’ कौन है.. इस ‘पर’ की पहचान क्या है? किसी के ‘पर’ हो जाने की प्रक्रिया क्या है? तुलसीदास का संदर्भ लें तो जिसे राम-वैद...
Keywords: कोलख्यान; परहित; पराईपीर; kolkhyan; hindi
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[texts]रात की अंतिम गाड़ी के पीछे - प्रफुल्ल कोलख्यान
रात की अंतिम गाड़ी के पीछेरात की अंतिम गाड़ी के पीछे की भुकभुकाती लाल बत्ती जब धीरे-धीरेपुतलियों से ओझल होती जा रही हो ठीक उस समय कितना असहाय होता हैप्लेटफॉर्म पर खड़ा यात्री, स्तब्ध, बेचैन औ...
Keywords: कोलख्यान; हिंदी; कविता; kolkhyan; hindi; kavita
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[texts]आओ हे नवजीवन - प्रफुल्ल कोलख्यान
तुम आओ मगर डाली से टूटकर पत्थर पर चढ़नेवाले फूलों की तरह नहींवन-उपवन में फैले गंध की तरह जिसके होने से घनघोर अंधेरे में भी देवता मन में बिहुँसते हैंबिना किसी आहट के उतरो इस जीवन में 
Keywords: कोलख्यान; कविता; हिंदी; kolkhyan; kavita; hindi
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[texts]अंतिम क्षण में जनतंत्र - प्रफुल्ल कोलख्यान
बिना किसी आदर्श के, बिना किसी नायक के किसी सामाजिकता की गत्यात्मकाता में आत्मीयता का कोई प्रसंग नहीं जुड़ता है। इसका एक कारण यह है कि आदर्श और नायक से ही लोगों के मनोजगत का तादात्मीयकरण संभव ह...
Keywords: कोलख्यान; जनतंत्र; आलोचना; प्रेमचंद; रघुवीर; kolkhyan; hindi
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[texts]दुःस्साध्य भाषिक कारीगरीः क़िस्सा कोताह - प्रफुल्ल कोलख्यान
जीवन में बदलाव की बयार बह रही है। साहित्य में इस बयार से एक नए तरह का वातावरण बन रहा है। विधाओं की परंपरागत सीमाएँ टूट रही हैं। इधर विधाओं के संदर्भ में यह सामान्य साहित्यिक प्रवृत्ति चलन में ...
Keywords: kolkhyan; hindi; कोलख्यान; राजेश; किस्सा; आलोचना
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